कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक लगभग 1–1.5 वर्ष के बच्चे (करीम अबू नास्सर) को गाज़ा के अल-मग़ाज़ी क्षेत्र में इज़राइली सैनिकों द्वारा हिरासत के दौरान कथित रूप से प्रताड़ित किया गया।
आरोपों के मुताबिक: बच्चे को उसके पिता से अलग किया गया। पिता से “कबूलनामे” के लिए दबाव बनाने हेतु बच्चे को सिगरेट से जलाया गया और नाखूनों से घायल किया गया। बताया गया कि यह घटना पिता की पूछताछ के दौरान हुई और बच्चा लगभग 10 घंटे बाद रेड क्रॉस के माध्यम से परिवार को सौंपा गया।
यह जानकारी मुख्यतः प्रत्यक्षदर्शियों, स्थानीय मीडिया और कुछ अंतरराष्ट्रीय आउटलेट्स पर आधारित है। इज़राइली सेना की ओर से इस घटना पर कोई आधिकारिक पुष्टि या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने पहले भी गाज़ा युद्ध (2023 के बाद) के दौरान फ़िलिस्तीनी बंदियों के साथ यातना और दुर्व्यवहार के आरोप दर्ज किए हैं। कुछ रिपोर्टों में इसे “सिस्टेमेटिक” यानी व्यापक पैटर्न का हिस्सा बताया गया है।
ऐसे अमानवीय लोमहर्षक और क्रूरतापूर्ण समाचार सिर्फ सूचना नहीं होते—वे समय के माथे पर उभरती हुई लज्जा बन जाते हैं। हाल में सामने आई वह घटना, जिसमें एक शिशु के साथ कथित क्रूरता की बात कही जा रही है, केवल एक खबर नहीं है; वह हमारे युग के नैतिक विवेक की परीक्षा है। यह ज़रूरी है कि हम इसे सनसनी या आवेग में नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक परिप्रेक्ष्य में समझें।
युद्ध हमेशा से मनुष्यता के लिए एक कठिन प्रश्न रहा है, लेकिन आधुनिक सभ्यता ने यह दावा किया था कि उसने युद्ध के भीतर भी कुछ सीमाएँ तय कर ली हैं—कुछ “रेड लाइन्स” जिन्हें पार करना अस्वीकार्य होगा। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून, जिनेवा संधियाँ, और मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणाएँ—ये सब उसी दावे के प्रतीक हैं। परंतु जब बार-बार ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, तो यह सवाल उठता है: क्या ये सीमाएँ वास्तव में प्रभावी हैं, या केवल कागज़ पर दर्ज नैतिक सांत्वनाएँ?
यहाँ समस्या केवल एक देश, एक सेना या एक घटना की नहीं है। यह उस व्यापक संरचना की समस्या है जिसमें शक्ति, सुरक्षा और राष्ट्रवाद का गठजोड़ अक्सर मनुष्य को “अन्य” में बदल देता है। जैसे ही कोई समुदाय “दुश्मन” घोषित होता है, उसके प्रति नैतिक उत्तरदायित्व धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। वह अब एक चेहरा नहीं, एक लक्ष्य बन जाता है; एक जीवन नहीं, एक “खतरा” बन जाता है। इसी बिंदु पर अत्याचार संभव होता है—और अक्सर “औचित्य” भी पा लेता है।
इतिहास गवाह है कि हर युद्ध में दोनों पक्ष अपने-अपने औचित्य गढ़ते हैं। कोई सुरक्षा के नाम पर, कोई प्रतिरोध के नाम पर। लेकिन इन औचित्यों के बीच सबसे पहले जो मरता है, वह है निर्दोष मनुष्य—और सबसे अंत में जो मरता है, वह है सत्य। एक शिशु, जो न राजनीति समझता है, न सीमाएँ, यदि वह भी इस क्रूरता के घेरे में आ जाता है, तो यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता की पराजय है।
मीडिया और सूचना के इस युग में एक और संकट उभरता है—सत्य का विखंडन। हर घटना कई संस्करणों में हमारे सामने आती है। आरोप और प्रत्यारोप के बीच सच्चाई धुंधली हो जाती है। ऐसे में एक सजग समाज का दायित्व है कि वह न तो बिना जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुँचे, और न ही संवेदनहीनता के कारण हर पीड़ा को “प्रोपेगेंडा” कहकर खारिज कर दे। संतुलन कठिन है, लेकिन आवश्यक भी।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि किसी एक घटना पर आक्रोश व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। यदि हम वास्तव में मानवीय मूल्यों के पक्षधर हैं, तो हमें हर प्रकार के अत्याचार के खिलाफ एक समान नैतिक दृष्टि रखनी होगी—चाहे वह किसी भी पक्ष द्वारा किया गया हो। चयनात्मक संवेदना अंततः अन्याय को ही मजबूत करती है।
प्रश्न यह है कि क्या हम उस बिंदु तक पहुँच चुके हैं जहाँ “सही” और “गलत” की भाषा ही अप्रासंगिक हो गई है? यदि हाँ, तो यह केवल युद्ध की नहीं, बल्कि मनुष्य की हार है।
सभ्यता की असली परीक्षा युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि मनुष्य को बचाए रखने में है। और जब भी किसी शिशु की चीख इस परीक्षा में गूँजती है, तो हमें रुककर यह पूछना चाहिए—क्या हम सचमुच आगे बढ़ रहे हैं, या केवल अपनी बर्बरता को नए औजारों से ढक रहे हैं?
वह अभी शब्द भी नहीं जानता
न “राष्ट्र”
न “सीमा”
न “दुश्मन” का अर्थ
उसकी दुनिया
बस उँगलियों की पकड़ थी
माँ की धड़कन
और पिता की छाती पर टिके
एक निश्चिंत दोपहर
लेकिन
युद्ध ने उसे भी पहचान लिया
जैसे वह कोई सवाल हो
जिसका जवाब
हिंसा के पास पहले से तैयार था
कहा गया
यह सुरक्षा है
पूछताछ है
यह ज़रूरी है
और उसी “ज़रूरत” की आग में
एक नन्हा शरीर
सुलगता रहा
उसकी चीख
किसी भाषा में दर्ज नहीं हुई
किसी रिपोर्ट की पंक्ति में
हूबहू नहीं उतर सकी
वह सिर्फ़
समय के माथे पर
एक जलता हुआ प्रश्न बन गई
क्या युद्ध इतना अंधा हो चुका है
कि उसे अब
चेहरे नहीं दिखते?
क्या “औचित्य”
इतना भारी हो गया है
कि एक शिशु की साँस
उसके नीचे दब जाए?
इतिहास गवाह है
हर बार
जब हमने “दुश्मन” कहा
हमने अपने भीतर
एक मनुष्य कम कर दिया
और हर बार
जब किसी मासूम की पीड़ा को
“प्रोपेगेंडा” कहकर टाल दिया
हमने अपने ही हृदय में
एक दरार और बढ़ा दी
दरअसल
यह कविता नहीं
एक गवाही है
कि सभ्यता अभी आदिम है
जिनेवा की किताबों से बाहर
अब भी
कहीं एक बच्चा रो रहा है
और उसकी वह रोती हुई आवाज़
पूछ रही है
क्या सचमुच
हम मनुष्य हैं?
(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)